Sunday, 13 March 2016


                                                               मौन को विदा


इक चुप्पी है,
जो पसरी रही है
मेरे तुम्हारे बीच।
अरसा हुआ
तुम्हारी पहली झलक पाये,
लफ़्ज़ भाप बन
उड़ से गए थे उस शाम
तुम्हारी आँखों की तपिश में;
और मौन जीता रहा खुद को
हमारे दरमियान।
ज़ोर डालता है
ये सन्नाटा अब
मेरे कानो पर,
मानो परदे फटने को हो
औ धडकनों का शोर
सोख लिया जाए
किसी अंतहीन गर्त में।

न , इस मौन को जाना  होगा।

ख्यालों के कुछ  सियाह बेताल
लाद रखें हैं मैंने ,
अपनी पीठ पर। 
खरोंचते हैं,
इनके नाखून
मेरे नंगे सीने को।
मेरी अनगिनत चिंताएं ,
डर, अवसाद,
सब  झांकते  हैं इनमें ;
किसी कोने में
गाहे बगाहे पुरानी बुश्शर्ट से
मिलने वाले सिक्को सी
खुशियाँ भी।

तुम्हें मुस्कुराते देखा है मैंने
हँसी जिंदा है तुम्हारी
और  तुम हँसी में
इसकी तासीर में
चोरी का पुट नहीं है,
ना रवायातो का ज़ोर।
बमुश्किल नाम से जानता हूँ तुम्हें
मगर पहचान बढाने का जी है।
कुछ कदम ही सही
अगर हमराह हो सको?
ख़याल बांटने हैं तुमसे, बाँटोगी ?

                                            -शेखर