Thursday, 3 March 2016

आह! तुम्हारी  स्मृतियाँ
लिपटी हैं जीवन से
चादर की सलवटों सी
जीवन की पिछली रात के
संक्षिप्त प्रेम के साक्ष्य सी
जो अपूर्ण रहा।

आह!  तुम्हारी स्मृतियाँ 
जुगाली करता हूँ मैं इनकी
मानो कोई चौपाया
गधा! हाँ शायद गधा
तुम्हारे दिए विशेषण
संज्ञा हैं अब मेरी।

आह! तुम्हारी स्मृतियाँ
पाश सी हैं 
प्रश्न कौंधता है
तुम तो कब की जा चुकी
पर मैं, मैं स्मृति आबद्ध क्यूँ ?

आह! तुम्हारी स्मृतियाँ
जीवन की सड़क पर
भावों की गर्मी से
कोलतार सी पिघलती हैं
चिपक जाते हैं पैर मेरे
दम लगाता हूँ पर छूटता नहीं
आगे बढ़ने के प्रत्येक प्रयास में
कुछ छोड़ आता हूँ अपना
मानो कोलतार से सनी हुई
एक चप्पल।
                                   -शेखर

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